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मुक्त ईहा✍✍

  • Jul 5, 2017
  • 1 min read

नज़्म लिखूं तो सोचूं ये कि क्या लिख दूं क्या छोड़ चलूं ज़िक्र तुम्हारा आये जब तो क्या भूलूं क्या याद करूं......

तेरी हर वो याद मेरे ज़ेहन में अब भी बस्ती है अब उन यादों के साये में हर दिन की शुरुआत करूं ....

मैं वो मुसव्विर बन बैठा हूँ जो जीवन के पन्नों पर सिर्फ तेरी तस्वीर उकेरूँ और उसी से बात करूं…..

हर वो अश्क जो मेरी आँखों में तन्हा रहता था अब उन अश्कों संग मैं फिर अपनी महफ़िल आबाद करूं....

नज़्म लिखूं तो सोचूं ये कि क्या लिख दूं क्या छोड़ चलूं ज़िक्र तुम्हारा आये जब तो क्या भूलूं क्या याद करूं...... ◆◆◆ मुक्त ईहा


 
 
 

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