ज़िंदगी और रास्ते.....
- Jul 22, 2017
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ज़िंदगी और रास्ते की तुलना में, दोनों का कहीं न कहीं अंत निश्चित है। फिर भी,,,, हम चलते रहते हैं बिना रुके-बिना थके, शायद तलाशते हुए मंज़िल को। पाना चाहते हैं असीम,बिना कुछ गंवाये, छाना चाहते हैं अंबर पर। चाहते हैं हर मोड़ पर,हर पड़ाव में, लोग ठिठकें तो हमारे लिए, कहें तो सिर्फ हमारे लिए, चलें तो बस हमारे अनुसार। किंतु शायद,,,, हम भूल जाते हैं कि, ज़िंदगी और रास्ते हमारे मुताबिक नहीं चलते। चलना तो हमें हैं उनपर। बढ़ना है आगे,पाना है बहुत कुछ। इसलिए ज़िंदगी और रास्तों में, हम निकल पड़ते हैं यूं ही कभी..... ढूंढ़ना चाहते हैं खुद को, मंज़िल और मौत के आने से पहले... @ मुक्त ईहा © https://smileplz57.wixsite.com/muktiiha






















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