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गहन चिंतन..

  • Jul 26, 2017
  • 1 min read

सादृश्य है अदृश्य है प्रश्नों भरा परिदृश्य है। कहीं शोर है कोई मौन है कोई स्वयंभू अलमस्त है। खर्ची चली उस नींव पर कुछ स्वप्न पड़े जहाँ ध्वस्त है। सुकून है विलुप्त सा हम दुनियासाजी में व्यस्त हैं। जिनके यक़ीन पे ज़िन्दगी की बाज़ी खेलने चले बदले हुए से लग रहे हमें आज वही शख्स हैं। बरसों का था वो साथ जो दो कदम पर थम गया कितने चेहरों पे चेहरों मढ़े यह देख हम स्तब्ध हैं। खौफ़ के सौदागरों ये न भूलना तुम कभी जग में सदा ही कलम सबसे बड़ा शस्त्र हैं। गण सारे सर्वोपरी के मद में उन्मुक्त हैं अहम् के वशीभूत हो सभी मदमस्त हैं । जिनको समूची धर्म शांति का दूत निर्धारित किया छुपकर दग़ा दे रहे हमको वही विश्वस्त हैं। भगवा-हरा रंग नहीं वर्चस्व का सवाल बन गया इंसानियत को बांटते ये कैसे अंधभक्त हैं। मंज़र है ऐसा की खुद को कौमों में बांटकर दुनिया जीतने की सोचते हम कैसे अल्पज्ञ हैं। स्वतंत्रता में भी बंदिशों की आ रही सड़ांध है जाने कैसी राह पर भविष्य ये प्रशस्त हैं। @ मुक्त ईहा © https://www.facebook.com/me.smriti.tiwari/ © https://smileplz57.wixsite.com/muktiiha 


 
 
 

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