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धर्म या अधर्म...

  • Jul 31, 2017
  • 1 min read

दें नाम धर्म या कहें अधर्म प्रतिबिंबित होता है बस कर्म।। खड्ग भी म्यान त्यागती है जब आहत होता है शब्दों का मर्म।। उपहास की हंसी ही गूंजी थी पासों का दरबार ही चीख उठा ।। अपमानित केशों ने प्रतिज्ञा ली आहूति चढ़ती रहीं जब छिड़ा रण ।। सत्ता का था जब एक खेल चला कुरुक्षेत्र रक्त से सींचा गया ।। सारथी के निर्देश का चक्र घूमा और टूटता गया शक्ति का भरम ।।। एक रेखा ही थी पार हुई फिर चंहु ओर चित्कार हुई ।। पावन अग्नि ने प्रमाण दिया किंतु समाज ने उसे दिया कलंक ।।। त्रिरूप जीवन पर दृष्टिपात हुआ रात्रि में सर्वस्व का त्याग हुआ ।। निर्वाण कथाएं निरुत्तर थीं निर्दोष यशोधरा ने जो पूछे प्रश्न ।। युग बदले आयी कथा कई नीति पलटी और दिशा नई ।। किंतु उलझे कुछ प्रश्नों का नहीं मिलता है कोई भी अंत ।।। उन्मादी लोगों के सम्मुख हम कब तक बनें रहें विनम्र।। मासूमों की करुण पुकार को सुन बेबस होने पर आती है शर्म।।। दें नाम धर्म या कहें अधर्म प्रतिबिंबित होता है बस कर्म।। खड्ग भी म्यान त्यागती है जब आहत होता है शब्दों का मर्म।। ~~ मुक्त ईहा © https://smileplz57.wixsite.com/muktiiha Like @ https://www.facebook.com/me.smriti.tiwari/ Follow@ https://www.instagram.com/mukht_iiha/ 


 
 
 

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