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वक़्त 🕛🕟🕚

  • Aug 8, 2017
  • 1 min read

सरपट दौड़ता हुआ कुछ पीछे भूलता हुआ कई ज़ख़्म ढांकता हुआ मुस्कान बाँटता हुआ । घड़ी की सुईयों को धकेल खिसकता हुआ रेत के माफ़िक लकीरों से फ़िसलता हुआ । दुनिया बदलता हुआ आप ही संभलता हुआ अनजान रास्तों से छुप बचके निकलता हुआ । अज़ीम को मुफ़लिसीे की मार से रौंदता हुआ रंक पे हो नज़ीर ताज़-ओ-तख़्त सौंपता हुआ । रह गया हर कोई सिर्फ हाथ मसलता हुआ यही वक़्त है ज़नाब सौ रंग बदलता हुआ । ● Śमृति @ मुक्त ईहा © https://smileplz57.wixsite.com/muktiiha Like @ https://www.facebook.com/me.smriti.tiwari/ Follow@ https://www.instagram.com/mukht_iiha/ 


 
 
 

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